कन दिन आणा
द्यखदे द्यखदे कन दिन आणा। कव्वा छन यख मोती खाणा।। बसगळ्या मिंढका दींणा भासण। मूसा - बिरोळा ताळी बजाणा।। स्याळ चिफळचट छन खापेकी। बळ्द बिचारा डींगा चपाणा।। बेसरमी को नाच चौतरफैं । सीदा सच्चा छन सरमाणा।। लस्ट - पस्ट करि जौन छक्वैकी। वूँ फर छन अब द्यबता आता।। *************************** रचना - सुशील पुखर्याळ संगलाकोटी पौड़ी गढ़वाल। Copyright@ Sushil Pukhryal -------------------------------------- --------------------------------------- उत्तराखंड की गढ़वाली हास्य/व्यंग्य कविता ; संगलाकोटी से गढ़वाली हास्य / व्यंग कविता ; एकेश्वर ब्लाक से गढ़वालीहास्य/ व्यंग्य कविता ; पौड़ी गढ़वाल से गढ़वाली हास्य/ व्यंग्य कविता ; मध्य हिमालय से गढ़वालीहास्य /व्यंग्य/ कविता ; उत्तरी भारत से गढ़वाली हास्य/व्यंग्...