कन दिन आणा
द्यखदे द्यखदे कन दिन आणा।
कव्वा छन यख मोती खाणा।।
बसगळ्या मिंढका दींणा भासण।
मूसा - बिरोळा ताळी बजाणा।।
स्याळ चिफळचट छन खापेकी।
बळ्द बिचारा डींगा चपाणा।।
बेसरमी को नाच चौतरफैं ।
सीदा सच्चा छन सरमाणा।।
लस्ट - पस्ट करि जौन छक्वैकी।
वूँ फर छन अब द्यबता आता।।
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रचना - सुशील पुखर्याळ
संगलाकोटी
पौड़ी गढ़वाल।
Copyright@ Sushil Pukhryal
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कृपया इस गढ़वाली कविता को अवश्य पढ़ें।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना पुखर्याल जी। गजब।।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार बंधुवर🙏
हटाएंबहुत सुंदर रचना पुखर्याल जी। गजब।।
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